Wednesday, June 13, 2012

लघु कहानी -लंबित न्याय



लंबित  न्याय
35 वर्ष की सेवा के बाद  31 जनुअरी ,2002 को कलक्टर कार्यलय में अधीक्षक  
पद से  सेवा-निवृत ज्ञानस्वरुप भार्गव का  कार्यलय में भव्य विदाई  समारोह  
हुआ  | स्वयं कलक्टर ने उनके  कार्य  कीप्रशंसा करते हुए सफापहनाकर स्वागत  
किया | उन्हे घर  तक छोड़ने आये साथियों को अल्पाहार कराया गया |ज्ञानस्वरूप 
ने अपने बहिन-बहनोई और दोहिते को भेंट-उपहार देकर विदा किया
दूसरे दिन से श्रीभार्गव अपनी पेंशन की स्वीकृति जारी कराने हेतु पेंशन विभाग 
के चक्कर लगाये विलम्ब होते देख श्री भार्गव पेंशन अधिकारी से अनुनय-
विनय करने लगे तो पेंशन अधिकारी ने उनका पेंशन प्रकरण इस आक्षेप के 
साथ लौटा दिया क़ि श्री भार्गव  द्वारा माह जनवरी से नवम्बर,1974 की अवधि  
में अवैतनिक अवकाश  के कारण  उनकी वेतन वृद्धियां संशोधित  करते हुए
सेवा-निवृति तक सम्पूर्ण वेतन संशोधित करपेंशन प्रकरण पुनः भिजवावे |
कलक्टर द्वारा वेतन कम  करते हुए संशोधित पेंशन-प्रकरण  भिजवाया, इस 
आधार पर पेंशन कम स्वीकृत होने पर श्री भार्गव ने अपने वकील से नोटिस 
भिजवाया क़ि उनके द्वारा चिकत्सा आधार पर ली गयी अवकाश अवधि का 
वेतन स्वीकृत किया गया था। उस अवधि में दी गयी वेतनवृद्धि महालेखाकार 
के अंकेषण-दल ने भी सही माना था अतः पेंषन लाभों में कटौती गलत है | 
कलक्टर एवं पेंशन विभाग  से अनुकूल उत्तर न मिलने के कारण आखिर दो 
वर्ष बाद सीधे  ऊच्च-न्यायालय में वाद प्रस्तुत  किया गया | उच्च-न्यायालय 
में गत वर्षो से मामला विचाराधीन है |
   इसी दौरान श्री ज्ञानस्वरूप भार्गव लकवे से पीड़ित हो गए | भार्गव की पत्नी 
तारीख पेशी पर न्यायालय जाने लगी, जहाँ वकील साहिब का मुंशी हर बार 50
रूपए ले लेता है |आखिर भार्गव की पत्नी निर्मला ने हिम्मत कर मुख्य-मंत्री 
से प्रार्थना की | मुख्य-मंत्री के सचिव ने पेंशन निदेशक से बात कर जानकारी 
की और निर्मला को बताया क़ि आपका मामला तो न्यायलय में लंबित है,अतः 
इस मामले में सरकर कुछ भी नहीं कर सकती | न्यायलय में आपसे पहले 
हजारों मामले विचाराधीन है, ऐसे में आप अपना दावा न्यायलय से वापिस 

लेकर जो पेंशन लाभ मिले, लेकर संतुष्ठी करो, इसी में आपकी  भलाई है |
    थक कर निर्मला ने न्यायलय से मुकदमा वापिस लेने का मन बना अगले 
दिन वकीलजी से मिलने का निर्णय किया | प्रातः काल चाय लेकर अपने पति 
को जगाने गयी तो श्री भार्गव नहीं जगे | डाक्टर को बुलवाया,जिसने श्री भार्गव 
की  ह्रदय गति रूक जाने के कारन म्रत्यु हो जाना बताया बेचारी निर्मला पर 
तो मानों पहाड़  ही टूट पड़ा | सामाजिक रिवाज के कारण  एक माह तो घर से 
नहीं निकली | एक माह पश्चात  न्यायलय में अपने पति का म्रत्यु प्रमाण-पात्र 
लगापेंशन प्रकरण का सहानुभूति पूर्वक निपटारा  करने का आवेदन किया
आखिरकार न्यायाधीश महोदय ने श्री भार्गव के पक्ष में निर्णय देते हुए कहाँ 
क़ि मामले में अवकाश अवधि का मामला 25 वर्ष पुराना है | इन 25 वर्षो में 
कई बार जांच और अंकेक्षण होने, वेतन स्थिरी-करण होनेवेतनवृधि आदि 
पर लेखाधिकारी  द्वारा "सेवेभिलेख की सम्पूर्ण जांच कर वेतन निर्धारण एवं 
वेतन-वृद्धियां सही पाई गयी" का प्रमाणपत्र अंकित है| ऐसे में सेवा-निवृति पर
पेंशन विभाग द्वारा आक्षेप लगा,पेंशनर लाभों से वंचित रखना अनुचित है
पेशनरों के प्रति सरकार को संवेदनशील होना चाहिए अब श्रीभार्गव की पत्नी 
को बगैर वेतन कम किये पेंशन स्वीकृत कर, श्रीभार्गव की म्रत्यु से सात वर्ष 
तक नियमानुसार मूल पेंशन राशिएवं एरियर राशि का अविलं भुगतान मय 
ब्याज किया जावे, तथा 50  हजार रुपये बतौर हर्जाने के साथ समस्त भुगतान 
एक माह में करे |विलम्ब से मिले न्याय पर बेचारी निर्मला  के मुहं से निकला- 
काश मेरे पति को न्यायउनके जीवित रहते मिल पाता"
सन्देश - न्याय में भले ही अंधेर न हो, पर देर होने से न्याय का परिणाम जानने
वाला ही नहीं रहा तो न्याय कैसा ?  
-लक्ष्मण रामानुज लडीवाला,जयपुर  



Saturday, June 2, 2012

जल बिन तृष्णा से जल जल कर -------

जल बिन तृष्णा से जल जल कर -------

अनल अनिल आकाश प्रथ्वी और जल,
पञ्च तत्व के योग से ही निर्मित तन |
जल बिन न नदी नाले, न जलाशय भर पाते,
भांप बने जल से ही, मेघ बन बरसते गरजते |
जल से ही कल कल करती बहती-
पावन गंगा-यमुना सरयू और सरस्वती,
जल से ही वन-उपवन की बगिया-
जल से ही आच्छादित यह हरियाली धरती|
जल नहीं तो जीवन नहीं, जल से ही व्यापार है,
जल में ही खैवत है नैया, जल से ही बेडापार है |
रहीमजी भी दे गए, पानी (जल) रखिये सीख,
जल बिन न बना पायेगा, मोती कोई सीप |
जल होगा तभी करुना के आंसू छलकेंगे,
नैनं जल से ही करुना निधि पग धोयेंगे |
जल बिन न निर्मल तन होगा-
मन भी रहेंगा कलुषित,
जल को अब तो संचित करो,
इसको करो न प्रदूषित |
आखिर गंगा-जल से तर्पण से ही मोक्ष पायेंगे,
जल बिन तृष्णा से तो, जल जल कर मर जायेंगे|

-लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला, जयपुर     

Sunday, April 22, 2012

लघु कहानी - विवाह का बजट


लघु कहानी 
विवाह का बजट   
निर्मलकुमार नुवाल ने अपने परिचित कमलेशजी कांकर की
लड़की से अपने जीजा श्री लवकुमार लक्ष के पुत्र व अपने भांजे 
लोकेन्द्र का विवाह  तय कराया | निर्मल कुमार ने अपने जीजा  
द्वारा बगैर पूंछे ही बार-बार यह दुहराया कि मेरी तो कमलेशजी 
कांकर से दो-ढाई लाख की ही बात हुई है | हर बार जीजा ने स्पष्ट 
किया कि जो बजट है उसी में किस प्रकार शादी संपन्न करनी 
है,तखमीना बनवा अवगत करादे | बजट की कोई बात नहीं है |

बिर्मल कुमार अपने से ज्यादा प्रतिष्ठित परिवार के अपने जीजा
से यह अपेक्षा करते थे कि वे हर कार्य उसकी ही रायसे करे |अंत   
में शादी बड़ी ही शालीनता पूर्वक सादगी से करते हुए कमलेशजी  
ने अपने समधी और बेटी को ख़ुशी-ख़ुशी बिदा किया |

कुछ समय पश्चात ही निर्मल कुमार के लड़के अमन कि शादी के 
प्रयास शुरू हुए | पर काफी समय इन्तजार करने पर भी अच्छे
प्रस्तावों को मानों सांप सूंघ गया हो | अपने जीजा से अच्छे बजट
प्रस्ताव की आशा न होने के बावजूद अमन कि बढती उम्र के कारण
तथा बड़े लड़के की शादी में विलम्ब  की वजह से अपने छोटे बेटे
पवन की भी बढती उम्र को देखते हुए अपने जीजा से बात की |

आखिर जीजा लव कुमार लक्ष के मित्र श्यामजी द्वारा एक अच्छे 
परिवार की सुशिक्षित  कन्या मीरा का प्रस्ताव दिया, जिसमे 5-6 
लाख रुपये लगाने का बजट बताया | लड़की पसंद करने के बाद 
लड़के के पिता निर्मल कुमार नुवाल ने अपने जीजा से कहाँ- 
जीजाजी,आपही बताओ इस कमर-तोड़ महंगाई में 5-6 लाख से 
क्या टीकी लगेगी ? जगह, पंडाल, सजावट, मिलनी, दांत,डायजा,
जीमन, लड़की की पेटी, आदि इस बजट में कैसे निपटेगा ? 

-लक्ष्मण प्रसाद लडीवाला,जयपुर 

Monday, January 16, 2012

क्षनिकाए :-

क्षनिकाए :-
माधुर्य
(वाणी का माधुर्य)
वाणी का माधुर्य
 जीवन को विस्तार देता है 
जहाँ प्रेम है 
वहां लेन-देन नहीं है 
(देना ही देना है)
कोई व्यापार नहीं है | 
मुस्कान 
मानव मन का दर्पण 
श्रेष्ठता का प्रमाण-पत्र
मन की निर्मलता का-
प्रतिबिम्ब 
आंखे :
इंसानी भांवो की झलक 
चेहरे का भांव 
दू:ख 
सुख का साधन 
सु:ख 
दूर क्षित पर अंकित 
असंभव है टंकित 
जीवन :
कर्मो का प्रतिफल 
सु:ख - दू:खं का अहसास 
भावी जीवन की आस 

रचना : लक्ष्मण लडीवाला
१६५,गंगोत्री नगर , टोंक रोड 
जयपुर (राज) 302018 

Saturday, January 14, 2012

माँ की दुआ

        माँ की दुआ 
बड़े बड़े ज्ञानी भी कह चुके है 
सफल प्रयोग भी कर चुके है 
मिले न मिले अपनों की दुआ 
नहीं मालूम कब होगी ईश दुआ 
जो चाहो सब कुछ पा जाओगे -
अगर मिल जाये माँ की दुआ |
जग जाहिर है माँ की शक्ति 
इससे बढ़कर औ किसकी भक्ति 
किसी की दुआ लगती न लगती 
पर माँ की दुआ अवश्य ही लगती 
जो चाहो अपना कल्याण 
रखो सदा ही माँ का ध्यान 
द्वारा- लक्ष्मण लडीवाला,जयपुर 

Friday, December 30, 2011

मोती की खुशबु

 मोती की खुशबु 
हे जलधि जब कोई ग़ोताखोर 
तुम्हारे गर्भ में ग़ोता  लगाता है 
जलधि का मन मयूर कहता है 
यदि तुम 
गर्भ में घुस मोती चुग 
दूर हो जाओंगे 
प्यार को वासना युक्त 
आँखों से देखा जायेंगा
किन्तु गर -
गर्भ में ही लीन हो जाओगे  
प्यार पूज्य हो जायेंगा 
फूल-सा चेहरा खिलेगा 
चमन में खुशबु महकेगी 
कोई किसी को 
आप्प्त्ती नहीं होगी  
रचना - लक्ष्मण लडीवाला, जयपुर  
dated 31-12-11